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महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट, जिसकी अगुवाई स्वयं महाकवि प्रसाद की प्रपौत्री डॉ. कविता प्रसाद कर रही हैं, भारतीय साहित्यिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का संवाहक बनकर उभरी है। यह ट्रस्ट उस महान दूरदृष्टा की स्मृति में स्थापित किया गया है, जिसने आधुनिक हिंदी साहित्य को कामायनी, आँसू, ध्रुवस्वामिनी और चंद्रगुप्त जैसी अमर कृतियों का अतुल्य उपहार दिया।
यह ट्रस्ट केवल विरासत को संजोने का प्रयास नहीं करता—
यह संस्कृति को पुनः जीवित, गतिमान और जन-जन से जोड़ने का संकल्प है।
->ट्रस्ट द्वारा संचालित:
सांस्कृतिक उत्सव
शैक्षिक जागरूकता कार्यक्रम
दुर्लभ पांडुलिपियों का संरक्षण
साहित्यिक धरोहर का डिजिटलीकरण
शोध व प्रकाशन
इन सभी के माध्यम से प्रसाद जी की विरासत को आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा-स्त्रोत बनाया जा रहा है। ट्रस्ट का प्रतिष्ठित कार्यक्रम ‘साहित्य–संस्कृति संवाद महोत्सव’ देश के श्रेष्ठ साहित्यकारों, नाटककारों, कलाकारों और विद्वानों को एक मंच पर लाकर परंपरा और नवाचार का अद्भुत संगम रचता है।
ट्रस्ट युवा प्रतिभाओं को छात्रवृत्ति, फेलोशिप, लेखन–कार्यशालाओं और मार्गदर्शन के माध्यम से प्रोत्साहित करता है। साथ ही, यह संस्कृति और साहित्य को भारत के सामाजिक विकास का अंग बनाने हेतु विभिन्न संस्थानों व कॉरपोरेट्स को CSR साझेदारी के लिए आमंत्रित करता है।
आपका प्रत्येक सहयोग—चाहे प्रायोजन हो, दान हो या सहभागिता—
सीधे उन महत्वपूर्ण परियोजनाओं को शक्ति देता है जिनसे
दुर्लभ पांडुलिपियाँ संरक्षित होती हैं, नए लेखक सशक्त होते हैं,
और भारतीय संस्कृति की आत्मा वैश्विक मंच पर पुनः उज्ज्वल होती है।
आज जब संसार अपनी जड़ों से लगातार दूर होता जा रहा है,
ऐसे समय में महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट एक दृढ़ संकल्प की तरह खड़ा है—
साहित्यिक चेतना का वाहक, सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक,
और सृजनशील ऊर्जा का अखंड स्रोत।
इस मिशन से जुड़ना केवल समर्थन नहीं—
भारत की सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखने,
युवा पीढ़ी को सशक्त बनाने,
और भविष्य के भारत को सांस्कृतिक रूप से समृद्ध करने का व्रत है।
“डॉ. कविता प्रसाद —महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट की संस्थापक, महान कवि, नाटककार, कथाकार, उपन्यासकार, निबंधकार और छायावाद युग के प्रमुख प्रवर्तक महाकवि जयशंकर प्रसाद की प्रपौत्री हैं। उनका जन्म और पालन–पोषण काशी (वाराणसी) के चेतगंज स्थित "प्रसाद मंदिर", अर्थात् महाकवि प्रसाद के पुश्तैनी आवास में हुआ, जहाँ साहित्य और संस्कृति की गहरी साधना पीढ़ियों से प्रवाहित होती रही है। उनकी माता 'श्रीमती कृष्णा देवी' और पिता 'श्री आनंद शंकर प्रसाद' (जो 'श्री रत्न शंकर प्रसाद' के सुपुत्र तथा 'महाकवि जयशंकर प्रसाद' के पौत्र हैं) स्वयं साहित्यिक एवं सांस्कृतिक परंपरा के संवाहक रहे हैं।
डॉ. कविता प्रसाद साहित्य के उन्नयन, समृद्धि और प्रसार को अपना कर्तव्य मानकर महाकवि प्रसाद की अमूल्य साहित्यिक विरासत को नई पीढ़ियों तक पहुँचाने के संकल्प के साथ कार्यरत हैं। उनका उद्देश्य केवल स्मृतियों को संरक्षित करना नहीं, बल्कि प्रसाद जी के विचार–विश्व को आधुनिक समाज में पुनः जीवित करना है, ताकि साहित्य, संस्कृति और भारतीय चेतना की यह दिव्य धारा निरंतर प्रवाहित होती रहे।”
“श्री अवधेश गुप्ता —महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट के संस्थापक, एक दूरदर्शी, संवेदनशील और समर्पित साहित्य-सेवी हैं। उन्होंने महाकवि प्रसाद की सांस्कृतिक एवं साहित्यिक विरासत को सुरक्षित रखने और उसे नई पीढ़ी तक पहुँचाने के पवित्र संकल्प को अपने जीवन का ध्येय बना लिया है। उनके लिए ट्रस्ट का निर्माण केवल एक संस्थागत पहल नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, कला और साहित्य की उस चेतना को पुनः प्रज्ज्वलित करने का मिशन है, जो समय के साथ धुंधली पड़ती जा रही थी। प्रसाद जी के रचनात्मक वैभव को आधुनिक समाज से जोड़ने की यह उनकी दृष्टि ही उन्हें एक सच्चा सांस्कृतिक संरक्षक बनाती है।
नाट्य समारोहों, कला प्रदर्शनों, साहित्यिक व्याख्यानों, शोध-सेमिनारों, संवाद-चर्चाओं से लेकर दुर्लभ पांडुलिपियों के संरक्षण तक—हर प्रयास में श्री गुप्ता जी की अथक निष्ठा और भावपूर्ण समर्पण स्पष्ट दिखाई देता है। उन्होंने प्रसाद जी की कृतियों को केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि उन्हें एक जीवंत, अनुभूति-सम्पन्न और जनमानस को स्पर्श करने वाला अनुभव बनाकर समाज के समक्ष प्रस्तुत किया है। उनका कार्य मात्र एक प्रबंधन नहीं, बल्कि एक निरंतर चलने वाली सांस्कृतिक साधना है।”
महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट से जुड़ना केवल साहित्य-संरक्षण का कार्य नहीं है, यह भारत की आत्मा से संवाद करने का एक जीवंत प्रयास है। यह वह सेतु है जो हमारी प्राचीन संस्कृति, सभ्यता और रचनात्मक चेतना को आज के आधुनिक युग से जोड़ता है।
प्रसाद जी की मूल पांडुलिपियों, विचारों और सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा है। यह नई पीढ़ी को उसकी जड़ों से परिचित कराता है, आत्मगौरव से भरता है और भारतीयता के उज्ज्वल मूल्यों को पुनः प्रतिष्ठित करता है।
ट्रस्ट के साथ आपका प्रत्येक सहयोग एक सांस्कृतिक सूर्य है—जो आने वाली पीढ़ियों के लिए चेतना के निरंतर प्रकाश से प्रज्ज्वलित रहेगा।
भारतीय संस्कृति के संवाहक बनें।
महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट का समर्थन केवल सहायता नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा, परंपरा और सभ्यतागत चेतना के पुनर्जागरण का सामूहिक संकल्प है।
आपका योगदान आने वाले समय को यह संदेश देता है कि हमारी जड़ें केवल पुरानी नहीं—बल्कि गहन, उज्ज्वल और शाश्वत हैं।
“राष्ट्र तभी जीवंत रहता है, जब उसकी संस्कृति सतत प्रवाहित होती रहे।
आइए, इस जीवन-धारा की रक्षा हम सब मिलकर करें।”
— डॉ. कविता प्रसाद
प्रपौत्री — महाकवि जयशंकर प्रसाद
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