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महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट का मिशन है—भारत के महानतम साहित्य–ऋषियों में से एक की अमर साहित्यिक धरोहर में नव–प्राण फूँकना तथा उनकी संदेश–पूर्ण वाणी को आदर, गाम्भीर्य और प्रेरणा के साथ आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाना। ट्रस्ट प्रसाद जी की कविता, नाटक, दर्शन और संस्कृति संबंधी कृतियों के संरक्षण एवं प्रचार–प्रसार के लिए समर्पित है, ताकि मानवता, अध्यात्म और राष्ट्रीय अस्मिता पर आधारित उनके विचार आधुनिक समाज को निरंतर समृद्ध करते रहें।
ट्रस्ट का उद्देश्य भारत की साहित्यिक परंपरा में निहित उस दिव्य ज्वाला को पुनः प्रज्वलित करना है, जो चिंतन को गहराई देती है और संस्कृति को जीवंतता प्रदान करती है—इसे अधिक सुलभ, अधिक संदर्भित और अधिक प्रेरक रूप में समाज तक पहुँचाना ही इसका संकल्प है।
साथ ही, ट्रस्ट रचनात्मकता, ज्ञान और कलात्मक अभिव्यक्ति के लिए एक सक्रिय, समृद्ध और ऊर्जावान पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करने के लिए कार्यरत है। यह युवा प्रतिभाओं को प्रोत्साहन, नए कलाकारों को अवसर, तथा साहित्य, रंगमंच, अनुसंधान और सांस्कृतिक नवाचार को ठोस मंच प्रदान करता है।
प्रसाद जी के आदर्श—सौहार्द, नैतिक दृढ़ता, कलात्मक प्रतिभा और बौद्धिक स्वतंत्रता—ट्रस्ट के मार्गदर्शक दीपस्तंभ हैं। इन्हीं के प्रकाश में यह समाज को उच्च मूल्यों, गहन समझ और सांस्कृतिक उन्नयन की दिशा में प्रेरित करता है। सार रूप में, ट्रस्ट भारत की साहित्यिक आत्मा का वाहक बनकर—प्रकाश फैलाने, चेतना को ऊँचा उठाने और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध भविष्य निर्माण का संकल्प निभा रहा है।
महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट की प्रभावशाली दूरदर्शिता
ट्रस्ट एक ऐसे भविष्य की कल्पना करता है जहाँ भारत की सांस्कृतिक चेतना प्रसाद जी की अद्भुत कला, दर्शन और काव्य-प्रज्ञा से आलोकित हो। ट्रस्ट का उद्देश्य है कि भारत की शास्त्रीय साहित्यिक परंपरा को पुनर्जीवित कर उसे आधुनिक समाज की प्रेरक शक्ति बनाया जाए। प्रसाद जी की मानवीयता, सौहार्द और राष्ट्रीय स्वाभिमान से ओत-प्रोत विचारधारा को संरक्षित करते हुए ट्रस्ट भारत की बौद्धिक और कलात्मक धरोहर के प्रति गहन सम्मान का भाव विकसित करना चाहता है। इसका स्वप्न है एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण—जहाँ साहित्य, रंगमंच और सृजनात्मक अभिव्यक्तियाँ नव ऊर्जा और नए संकल्पों के साथ फलें-फूलें।
साथ ही, ट्रस्ट नई पीढ़ी को ऐसे अवसर प्रदान करना चाहता है जो उन्हें सृजनात्मक सोच, नैतिक संवेदनशीलता और सांस्कृतिक समझ की दिशा में सशक्त बनाएँ। अनुसंधान, प्रकाशन, महोत्सवों, शैक्षिक कार्यक्रमों और कलात्मक मंचों के माध्यम से यह उत्कृष्टता को बढ़ावा देते हुए एक जीवंत और समृद्ध सांस्कृतिक पारिस्थितिकी का निर्माण करना चाहता है।
प्रसाद जी की कालातीत दृष्टि—प्रकाश, आत्मबल और मानवता की—से प्रेरित होकर यह ट्रस्ट समाज के लिए एक मार्गदर्शी प्रकाश बनना चाहता है, जो हमें अपनी जड़ों को पुनः खोजने, अपनी परंपराओं की समृद्धि को अपनाने और प्रज्ञा, आत्मविश्वास तथा रचनात्मक तेजस्विता के साथ आगे बढ़ने का आह्वान करता है।
महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट के मूल्य
ट्रस्ट की नींव उन कालातीत आदर्शों पर टिकी है—सत्य, सृजनशीलता, करुणा और सांस्कृतिक गरिमा—जिन्होंने स्वयं प्रसाद की अद्वितीय साहित्य–यात्रा को दिशा दी। ट्रस्ट भारतीय कला, संस्कृति और आध्यात्मिक विरासत के संरक्षण को अपने पवित्र कर्तव्य के रूप में ग्रहण करता है, ताकि प्रत्येक पहल में वही गहराई, सौंदर्य और refinement झलके, जो प्रसाद के साहित्य का मूल स्वर रही है।
ट्रस्ट मानव–एकता, नैतिक शक्ति, और बौद्धिक स्वतंत्रता के उन आदर्शों को भी हृदय में सँजोए रखता है, जो समाज को ऊँचा उठाने वाली सृजनात्मक शक्तियाँ हैं। उसका विश्वास है कि साहित्य और संस्कृति केवल अभिव्यक्ति के माध्यम नहीं, बल्कि समाज को उजाला देने वाले चेतना–दीप हैं। इन्हीं मूल्यों के सहारे ट्रस्ट ऐसा वातावरण निर्मित करता है जहाँ ज्ञान का सम्मान, रचनात्मकता का उत्सव, और सांस्कृतिक पहचान का सुदृढ़ीकरण स्वाभाविक रूप से संभव हो सके।
समान रूप से महत्वपूर्ण हैं वे मूल्य जो प्रतिभा–पोषण, विद्वत्ता के प्रोत्साहन, और युवा मनों में सार्थक अभिव्यक्ति को बढ़ावा देते हैं। ट्रस्ट विचार–मुक्ति, कलात्मक नवोन्मेष, और उत्कृष्टता की निरंतर आकांक्षा को मूल्यवान मानता है—ताकि नई पीढ़ी गहराई से सोच सके, नैतिकता को जीवन में उतार सके, और समाज के लिए सकारात्मक योगदान दे सके; ठीक वैसे ही जैसे प्रसाद ने अपने काव्य और दर्शन में स्वप्निल भविष्य की कल्पना की थी।
अंततः, ट्रस्ट के ये मूल्य उसकी जीवंत आत्मा हैं—
ईमानदारी, प्रेरणा और सांस्कृतिक गर्व का ऐसा सशक्त आधार जो प्रसाद की प्रज्ञा और दृष्टि से समाज को आलोकित करने का मार्ग प्रशस्त करता है।
नमन—
हमारे प्रपितामह महाकवि जयशंकर प्रसाद जी का जन्म काशी के समृद्ध सुंघनी-साहू व्यावसायिक परिवार में हुआ। उनके पितामह तंबाकू के बड़े व्यापारी थे और एक विशेष प्रकार की सुगंधित सुरती बनाने के कारण सुंघनी-साहू नाम से लोकप्रिय थे। प्रसाद जी के माता-पिता की इच्छा थी कि बड़ा पुत्र (शंभू रत्न) व्यवसाय देखे और छोटा पुत्र (जयशंकर) साहित्य रचे। जब उनका पांच मास में अन्नप्राशन संस्कार हुआ, उस समय प्रसाद जी ने दूसरी वस्तुओं को छोड़कर लेखनी उठा ली थी, तभी उनके भविष्य का सही संकेत मिल गया था। प्रसाद जी ने अपनी लेखनी से अपने पूर्वजों को नमन, श्रद्धा से करते हुए उन्हें अमर कर दिया।
- 11वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में गहड़वाल वंश के अंतिम राजा जयचंद को परास्त कर मोहम्मद गौरी ने ऐसा आतंक फैलाया जिससे जनता सामूहिक पलायन के लिए विवश हो गई। फलस्वरूप हमारे पूर्वज कन्नौज से गंगा मार्ग से पूर्व की ओर बढ़े और सैदपुर भितरी की भूमि पर तीन शताब्दियों तक अधिवास किया।
- 16वीं शताब्दी के मध्य में पूर्वजों को वहां से हटना पड़ा और पुनः गंगा के तट से काशी के पश्चिम में कुछ ही आगे अवस्थित मौजा बैरवान में वंश का दूसरा पड़ाव पड़ा।
- 18वीं शताब्दी के उत्तर भाग में केसरा देवी और गुरुसहाय साहू के आदेश से जगन साहू के पौत्र गणपाति साहू और गोवर्धन साहू ने गणपतेश्वर शिवलिंग की प्रतिष्ठा की जो वर्तमान में टेढ़ी नीम नाम का एक मोहल्ला वाराणसी में स्थित है।
गणपाति साहू के निधन के बाद उनके पुत्र शिवरत्न साहू टेढ़ीनीम-होजकटोरिया छोड़कर गोवर्धनसराय में बस गए और शिवालय बनवाकर शिवरत्नेश्वर लिंग की स्थापना की। शिवरत्न साहू के चौथे पुत्र देवी प्रसाद भी अपने पिता के समान ही शिवभक्त थे। देवी प्रसाद जी के दो पुत्र शंभू रत्न एवं जयशंकर प्रसाद हुए।
प्रसाद जी को प्रारंभिक शिक्षा के लिए विद्वानों की व्यवस्था की गई, लेकिन जैसे ही पिता के वियोग के साथ ही गृह कलह एवं संपत्ति विवाद का उन्हें सामना करना पड़ा। साहित्य रचना के साथ उन्होंने पूर्वजों के स्थापित तंबाकू के व्यवसाय पर ध्यान दिया। प्रसाद जी के एकमात्र पुत्र थे श्रीरत्नशंकर प्रसाद....
— डॉ. कविता प्रसाद, प्रपौत्र- महाकवि जयशंकर प्रसाद
आधुनिक भारतीय साहित्य, दर्शन और चिंतन के नभ में महाकवि जयशंकर प्रसाद (1890–1937) एक ऐसे ध्रुवतारा हैं, जिनकी तेजस्विता आज भी हमारी सांस्कृतिक चेतना को आलोकित करती है। वे मात्र कवि नहीं थे—वे एक द्रष्टा, एक युग-व्याख्याकार, और भारतीय आत्मा के सहस्राब्दियों पुराने सत्य के संवाहक थे।
‘कामायनी’ से लेकर ‘आँसू’, ‘ध्रुवस्वामिनी’ से ‘स्कन्दगुप्त’ तक, प्रसाद ने सिद्ध किया कि साहित्य केवल सौंदर्य नहीं—आत्मबोध का सेतु है; कविता केवल भाव नहीं—मानव चेतना का उत्कर्ष है; और संस्कृति केवल अतीत नहीं—भविष्य निर्माण की जीवंत शक्ति है।
उनकी कृतियाँ भारतीय दार्शनिकता की उज्ज्वल परंपरा—उपनिषदों, वेदों, बौद्ध करुणा, और भारतीय मानववाद—को आधुनिक संवेदनाओं से जोड़ती हैं। आज की अशांत, विभाजित और यांत्रिक होती दुनिया में, उनका संदेश मानवता के लिए एक प्रकाशस्तंभ की भांति है:
“संसृतियाँ तभी जीवित रहती हैं जब साहित्य मनुष्य को भीतर से रूपांतरित करे।”
प्रसाद का साहित्य गंगा की धारा की तरह है—गंभीर, पवित्र, सहज और जीवनदायी।
उनकी भाषा में संस्कृत की सौम्यता, अवधी की आत्मीयता और हिंदी की आधुनिक चेतना एक सूत्र में गुंथी हुई है।
उनके लिए साहित्य केवल रचना नहीं, साधना था; कला केवल सौंदर्य नहीं, शिव और सत्य का अनुभव थी। उनकी रचनाएँ किसी संप्रदाय या सीमा में बंधी नहीं—वे मनुष्य को उसकी मूल अवस्था में, एकता, करुणा और सृजनशीलता के शिखर पर ले जाती हैं।
आज, जब विश्व सांस्कृतिक भ्रम, मानसिक तनाव और नैतिक द्वंद्वों से गुजर रहा है, प्रसाद का साहित्य हमें याद दिलाता है कि—
भारतीय संस्कृति केवल स्मृति नहीं; वह एक सतत जागरण है।
डॉ. कविता प्रसाद—महाकवि प्रसाद की प्रपौत्री—ने इस ट्रस्ट की स्थापना केवल एक स्मारक बनाने के लिए नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण को जन्म देने के लिए की।
उनकी दृष्टि यह है कि प्रसाद की चेतना केवल पुस्तकों तक सीमित न रहे, बल्कि आधुनिक भारत की सोच, नीतियों और संवेदनाओं में जीवित रहे।
ट्रस्ट परंपरा और आधुनिकता, ग्रंथ और तकनीक, भाव और विज्ञान—इन सभी को जोड़ते हुए एक सांस्कृतिक आंदोलन का रूप ले चुका है।
ट्रस्ट तीन मुख्य स्तंभों पर आधारित है:
– पांडुलिपियों, दुर्लभ दस्तावेजों, नाट्य सामग्री और साहित्यिक धरोहर का संग्रह एवं डिजिटलीकरण।
– भारतीय ज्ञान–परंपरा का आधुनिक अभिलेखन।
– साहित्य, नाटक, संगीत, नृत्य, और कलाओं में नए प्रयोगों को प्रोत्साहन।
– युवा लेखकों और कलाकारों को मंच देना।
– विद्यालयों, विश्वविद्यालयों और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों से सहयोग।
– विचार–संवाद, संगोष्ठियाँ और सांस्कृतिक महोत्सव।
उनका ध्येय स्पष्ट है:
“भारतीय साहित्य की आत्मा को पुनः जागृत कर, संस्कृति को समाज के हृदय में पुनर्स्थापित करना।”
आज जब भारत विश्व-मंच पर अपनी पहचान सुदृढ़ कर रहा है, साहित्य और संस्कृति राष्ट्र की आत्मा बनकर उभर रहे हैं।
महाकवि प्रसाद ट्रस्ट आधुनिक भारत के विकास में संस्कृति को केंद्र में स्थापित करता है:
डिजिटल संस्कृति और क्लासिकल साहित्य का संगम
युवाओं में भारतीयता और सृजनशील चेतना का जागरण
नाट्य–कला और भारतीय थिएटर का पुनरुद्धार
भारतीय ज्ञान–परंपरा का वैश्विक प्रसार
यह ट्रस्ट आज के भारत को बताता है कि आर्थिक प्रगति तभी पूर्ण है जब सांस्कृतिक आत्मा सशक्त हो।
ट्रस्ट द्वारा आयोजित साहित्य–संस्कृति संवाद महोत्सव भारत का एक अद्वितीय अनुष्ठान बन चुका है, जिसमें:
शीर्ष साहित्यकार, नाटककार, संगीतज्ञ, विद्वान
प्रख्यात मंच कलाकार
युवा रचनाकार और छात्र
सभी एक मंच पर आते हैं।
यह आयोजन अतीत और वर्तमान का संवाद है—जहाँ शब्द संगीत बनते हैं, और विचार ऊर्जा बनकर प्रवाहित होते हैं।
ट्रस्ट मानता है कि यदि संस्कृति को जीवित रखना है, तो युवाओं को उससे जोड़ना होगा। इसलिए:
स्कॉलरशिप, फेलोशिप और क्रिएटिव राइटिंग वर्कशॉप्स
विद्यालय–विश्वविद्यालय सहयोग
ब्लॉगिंग, डिजिटल साहित्य, नाट्य प्रयोग, और सांस्कृतिक नेतृत्व प्रशिक्षण
युवा भारतीय साहित्य की नई धाराएँ बनें—यही ट्रस्ट का संकल्प है।
ट्रस्ट भारत की कंपनियों, संस्थाओं, और सरकारों को साथ लेकर:
सांस्कृतिक अभिलेखों का संरक्षण
प्रकाशन एवं अनुवाद परियोजनाएँ
ग्रामीण कला–विकास
सांस्कृतिक साक्षरता अभियान
जैसे राष्ट्रीय महत्व के कार्यक्रम चलाता है।
यह केवल CSR नहीं, भारतीय संस्कृति का राष्ट्रीय उत्तरदायित्व है।
ट्रस्ट का लक्ष्य है कि प्रसाद का साहित्य केवल भारत तक सीमित न रहे, बल्कि विश्व साहित्य के मानचित्र पर एक उज्ज्वल स्थान प्राप्त करे। इस हेतु:
अंतरराष्ट्रीय साहित्य उत्सव
विश्व–विश्वविद्यालय सहयोग
बहुभाषीय अनुवाद
भारतीय नाट्य–परंपरा का वैश्विक प्रदर्शन
भारतीय संस्कृति को वैश्विक संवाद में स्थापित करते हैं।
आज की दुनिया तेज़ी से बदल रही है, परंतु मनुष्य को स्थिरता साहित्य, दर्शन और संस्कृति से ही मिलती है।
महाकवि प्रसाद का संदेश और ट्रस्ट का मिशन हमें पुकारता है:
“स्मरण से आगे बढ़कर—पुनर्जागरण की जिम्मेदारी उठाइए।”
ट्रस्ट का समर्थन करना भारत की सांस्कृतिक आत्मा को पुनः प्रतिष्ठित करना है।
हर सहयोग—चाहे छोटा हो या बड़ा—भारत के सांस्कृतिक भविष्य में एक दीप प्रज्वलित करता है।
महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट केवल एक संगठन नहीं—एक चेतना, एक आंदोलन, एक जीवित सांस्कृतिक यज्ञ है।
यह यज्ञ तब तक चलता रहेगा जब तक—
हर काव्य सुरक्षित है,
हर युवा सृजन का साहस रखता है,
हर मंच पर भारतीय संस्कृति की गरिमा प्रतिबिंबित होती है,
और हर हृदय में सत्य, सौंदर्य और करुणा के दीप जलते रहते हैं।
महाकवि प्रसाद का साहित्य शाश्वत है—
और यह ट्रस्ट उस शाश्वत ज्योति का धधकता हुआ प्राण है।
महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट के साथ जुड़ना केवल साहित्य का संरक्षण नहीं—यह भारत की विरासत, संस्कृति, सभ्यता और रचनात्मक चेतना को आज के आधुनिक समय से जोड़ने की एक राष्ट्रधर्मी पहल है। प्रसाद जी की मूल पांडुलिपियों, विचारों और सांस्कृतिक धरोहर को सुरक्षित रखने का अर्थ है नई पीढ़ियों को उनकी जड़ों से जोड़ना, उनका आत्मविश्वास बढ़ाना और भारतीयता के उज्ज्वल स्वरूप को पुनः स्थापित करना। आपका हर सहयोग इस महान धरोहर को जीवित रखकर भविष्य की सांस्कृतिक चेतना को मजबूत बनाता है।
महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट का समर्थन करना मात्र सहयोग नहीं—
यह राष्ट्र की आत्मा, सनातन संस्कृति और सभ्यतागत चेतना को पुनर्जीवित करने का सामूहिक संकल्प है।
आपका हर सहयोग आने वाली पीढ़ियों को यह बताता है कि उनकी जड़ें कितनी गहरी, कितनी उज्ज्वल और कितनी शाश्वत हैं।
“एक राष्ट्र तभी जीवित रहता है, जब उसकी संस्कृति साँस लेती रहे—
आइए, इस सांस को, इस जीवन-धारा को हम सब मिलकर सुरक्षित रखें।”
— डॉ. कविता प्रसाद, प्रपौत्र- महाकवि जयशंकर प्रसाद