Select Language— हिंदी / English
Select Language— हिंदी / English
नाट्य एवं सांस्कृतिक आयोजन —
" महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट द्वारा आयोजित नाटक, संगीत-प्रस्तुतियाँ और विविध सांस्कृतिक कार्यक्रम भारतीय दर्शन, भारतीय विरासत और हमारी गहरी सांस्कृतिक चेतना के तेजस्वी उत्सव हैं। प्रत्येक आयोजन प्रसाद जी की उस कालातीत दृष्टि को जीवंत करता है, जहाँ काव्य, संगीत, नाटक, आध्यात्मिकता और सांस्कृतिक मूल्य एक साथ मिलकर ऐसा अनुभव रचते हैं, जो मन को स्पर्श करता है और बुद्धि को प्रकाशमान बनाता है।
कार्यक्रम केवल उनकी साहित्यिक परंपरा का संरक्षण भर नहीं करते, बल्कि भारतीय संस्कार, संस्कृति, सभ्यता और हमारी सनातन कलाधारा को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का माध्यम बनते हैं। यहाँ युवा कलाकारों को न केवल अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने का मंच मिलता है, बल्कि वे भारतीय ज्ञान-परंपरा, लौकिक-वैदिक सोच और सांस्कृतिक आदर्शों से भी गहराई से जुड़ते हैं।
हर प्रस्तुति में ट्रस्ट सौंदर्य, भावनात्मक गहराई, नैतिक प्रेरणा और सांस्कृतिक जागरण के ऐसे क्षण रचता है जो समाज को ऊँचा उठाते हैं। ये कार्यक्रम हमें स्मरण कराते हैं कि कला केवल मनोरंजन नहीं—बल्कि एक सशक्त साधना है, जो मानवता को आशा, सद्भाव, एकता और भारतीय सांस्कृतिक गौरव के सूत्र में पिरोने की अनुपम शक्ति रखती है।"
"कामायनी" | नागरी प्रचारिणी सभा वाराणसी की प्रस्तुति | निर्देशक- व्योमेश शुक्ल | प्रसाद मंदिर, चेतगंज, वाराणसी | महाकवि जयशंकर प्रसाद साहित्य-संस्कृति महोत्सव
महाकवि जयशंकर प्रसाद की “कामायनी” हिंदी साहित्य में विश्व का पहला और अब तक का अंतिम सम्पूर्ण भाव–महाकाव्य है—एक ऐसी रचना जिसे साहित्य, दर्शन और मानवीय संवेदना के सर्वोच्च शिखर पर स्थापित किया गया है।
यह महाकाव्य मानव-जीवन की गहराइयों, उसकी भावनात्मक तरंगों, बौद्धिक द्वंद्वों और आत्मिक खोज का अद्भुत दार्शनिक आख्यान है। मनु और श्रद्धा की कथा के माध्यम से प्रसाद जी ने मानव-मस्तिष्क की यात्रा, उसकी जिज्ञासा, जिजीविषा, भावनाएँ, संघर्ष और उत्थान को अत्यंत कलात्मक रूप में प्रस्तुत किया है—जहाँ बुद्धि, भावना और कर्म का दिव्य संतुलन जीवन की दिशा निर्धारित करता है।
कामायनी में प्रेम-त्याग, आशा-निराशा, उत्कर्ष-पतन, संघर्ष-शांति जैसे मानवीय अनुभवों की विराटता को इतनी मार्मिकता से उकेरा गया है कि यह महाकाव्य आज भी भारतीय साहित्यिक चेतना की धरोहर बना हुआ है।
प्रसाद जी इस महाकाव्य के माध्यम से स्पष्ट संदेश देते हैं कि जीवन का सार आस्था, विश्वास और संतुलन में निहित है—और जब मनुष्य बुद्धि और भावना दोनों के समन्वय के साथ जीता है, तभी वह सत्य मानवत्व को प्राप्त करता है।
कामायनी आज भी भारतीय संस्कृति, दर्शन और साहित्यिक परंपरा का दीप्तिमान प्रकाशस्तंभ है—जो पीढ़ियों को मार्गदर्शन, प्रेरणा और मानवता के उच्चतम मूल्यों की ओर अग्रसर करता है।
"स्कन्दगुप्त" | कामायनी संस्थान वाराणसी की प्रस्तुति | निर्देशक- अमलेश श्रीवास्तव | काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) | महाकवि जयशंकर प्रसाद साहित्य-संस्कृति महोत्सव
महाकवि जयशंकर प्रसाद का नाटक “स्कन्दगुप्त” भारत के पराक्रमी सम्राट स्कन्दगुप्त विक्रमादित्य के जीवन पर आधारित एक प्रभावशाली ऐतिहासिक कृति है। यह वह महायोद्धा था जिसने हूणों जैसे भीषण विदेशी आक्रमणकारियों से मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। प्रसाद जी ने इस वीर पुरुष को केवल एक योद्धा के रूप में ही नहीं, बल्कि धर्मनिष्ठ, उदार हृदय, त्यागी, समर्पित और अतुलनीय राष्ट्रभक्त के रूप में चित्रित किया है। उनके स्कन्दगुप्त के लिए व्यक्तिगत प्रेम और सुख से बढ़कर राष्ट्र की अखंडता सर्वोपरि है।
“स्कन्दगुप्त” राष्ट्रचेतना का प्रबल आह्वान है। यह नाटक दर्शाता है कि सच्चा शासक वही है जो अपने व्यक्तिगत आनंद, आराम और महत्वाकांक्षाओं से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को सर्वोच्च स्थान देता है।
इस अद्भुत कृति में प्रसाद जी भारतीय दर्शन की चिरंतन भावनाएँ अभिव्यक्त करते हैं—कर्तव्य ही धर्म है, और त्याग ही सच्ची विजय। “स्कन्दगुप्त” आज भी साहस, कर्तव्य, राष्ट्रनिष्ठा और भारतीय अस्मिता का शक्तिशाली प्रतीक बनकर पीढ़ियों को प्रेरणा देता है।
"आकाशदीप" | रंगशाला BHU की प्रस्तुति | निर्देशक- रवि कुमार राय | काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) | महाकवि जयशंकर प्रसाद साहित्य-संस्कृति महोत्सव
आकाशदीप जयशंकर प्रसाद की वह कालजयी कहानी है, जो भारतीय संस्कृति के मूल तत्व—आशा, करुणा, सत्य, कर्तव्य और आत्म–बल—को अद्भुत शक्ति से प्रकट करती है। चम्पा और बुद्धगुप्त की कथा केवल व्यक्तिगत संघर्ष नहीं, बल्कि उस भारतीय जीवन–दृष्टि का जीवंत रूप है जिसके अनुसार “अंधकार कितना भी गहरा हो, भीतर का दीपक बुझना नहीं चाहिए।” बंधन, अन्याय और विपरीत परिस्थितियों के बीच भी दोनों अपने धर्म, मर्यादा, मानवता और सत्य के पथ से विचलित नहीं होते—और यही आंतरिक उजाला “आकाशदीप” का वास्तविक प्रतीक है।
यह दीपक भारतीय विरासत के उस अमर दर्शन को उजागर करता है, जिसके केंद्र में आस्था की लौ, आदर्शों की ज्योति, और मनुष्य की अटूट जिजीविषा सदैव प्रज्वलित रहती है। प्रसाद जी दिखाते हैं कि भारतीय चिंतन में प्रकाश केवल रोशनी नहीं, बल्कि चेतना, नैतिकता, करुणा और आत्म–उत्कर्ष का प्रतीक है—वही प्रकाश जो समय, संघर्ष और विपत्ति के पार भी मानवता का मार्ग आलोकित करता है।
“आकाशदीप” हमें यह संदेश देता है कि भारतीय सभ्यता की शक्ति बाहरी वैभव में नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर जलती उस दिव्य लौ में बसती है, जो सत्य, विश्वास, धैर्य और प्रेम से संसार को आलोकित करती है। यही कारण है कि यह कथा आज भी भारतीय साहित्य, संस्कृति और मानवीय मूल्यों की एक प्रेरणादायी धरोहर के रूप में दीप्तिमान है।
"एक घूंट" | भारतरंग लखनऊ की प्रस्तुति | निर्देशक- चंद्रभास सिंह | काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) | महाकवि जयशंकर प्रसाद साहित्य-संस्कृति महोत्सव
एक घूँट केवल एक नाटक या कहानी नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज की आत्मा को झकझोर देने वाली एक प्रबुद्ध आवाज़ है। इस रचना में प्रसाद जी ने दिखाया है कि चाहे परिस्थियाँ कितनी ही संकुचित, कठिन या तिरस्कारी क्यों न हों — एक छोटा-सा “घूँट” भी आत्म–सम्मान, मानवीय गरिमा और त्याग का प्रतीक बन सकता है।
यह नाटक उन महिलाओं की गरिमा, उनकी संवेदनशीलता और उनकी नैतिक शक्ति का गुणगान है, जिन्होंने बाहरी दबाव, सामाजिक सीमाओं और अन्याय के बीच भी स्वयं की आत्म‑इज्जत और मानवीय मूल्य बनाए रखे। यह रचना हमें यही सिखाती है कि जीवन की सच्ची कीमत भौतिक सुख–सुविधाओं में नहीं, बल्कि स्वयं‑नियंत्रण, प्रेम, सम्मान, और मानवीय दायित्व में निहित है।
“एक घूँट” इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दर्शाती है कि मानव संबंध, आदर्श और आत्म‑विश्वास — जब दिलों में हों — तो व्यक्ति की असली शक्ति उजागर होती है। यह नारा देती है कि सच्चा जीवन वही है जिसमें त्याग, सम्मान, मानवता और सजगता का दीप जलता रहे।
"जयशंकर प्रसाद और प्रेमचंद के मित्रवत स्तम्भ -घटनाओं पर आधारित नाट्यमंचन" | कामायनी संस्थान वाराणसी की प्रस्तुति | निर्देशक- अमलेश श्रीवास्तव | केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान, सारनाथ | महाकवि जयशंकर प्रसाद साहित्य-संस्कृति महोत्सव
यह नाटक दो महान साहित्यिक व्यक्तित्वों—महाकवि जयशंकर प्रसाद और उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद—के जीवन और संस्मरणों पर आधारित है। दोनों समकालीन थे; प्रेमचंद प्रसाद से लगभग 10 वर्ष बड़े थे। नाटक उनके मित्रवत संबंधों, साहित्यिक संवादों और विचारों के आदान-प्रदान की घटनाओं पर केंद्रित है, जिसमें उनके व्यक्तिगत अनुभव, साहित्यिक संघर्ष और समाज के प्रति जिम्मेदारी को भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
इस नाटक में दिखाया गया है कि कैसे इस युग के दो महान रचनाकारों ने साहित्य के माध्यम से समाज को जागरूक करने, नैतिक मूल्य स्थापित करने और हिंदी साहित्य को नए आयाम देने का प्रयास किया। उनके संबंध केवल सहकर्मी या समकालीन गहरे सांस्कृतिक और बौद्धिक संवाद से जुड़े मित्रवत अनुभवों का प्रतिबिंब हैं।
यह नाटक दर्शकों को यह एहसास कराता है कि साहित्य केवल शब्दों का खेल नहीं, बल्कि समाज की चेतना और समय का साक्षी है। यह हमें प्रेरित करता है कि रचनात्मकता, मित्रता और सामाजिक जिम्मेदारी एक साथ चलकर इतिहास और साहित्य में स्थायी छाप छोड़ सकते हैं।
"शतरंज के खिलाड़ी" | कामायनी संस्थान वाराणसी की प्रस्तुति | निर्देशक- अमलेश श्रीवास्तव | केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान, सारनाथ | महाकवि जयशंकर प्रसाद साहित्य-संस्कृति महोत्सव
मुंशी प्रेमचंद की सुप्रसिद्ध कृति “शतरंज के खिलाड़ी” नवाबी लखनऊ की पृष्ठभूमि पर रचित एक कालजयी नाटक/कहानी है, जो उस युग के राजनीतिक पतन, सामाजिक शिथिलता और नैतिक शून्यता का सशक्त प्रतीक है। मीर और मिर्ज़ा—कहानी के दो नवाब—देश की स्थितियों से पूर्णतः अनभिज्ञ, विलासिता और खेलों में डूबे रहते हैं, जबकि दूसरी ओर अंग्रेज़ धीरे-धीरे भारत की सत्ता पर क़ब्ज़ा करते जाते हैं।
प्रेमचंद इस मार्मिक कथा के माध्यम से बताते हैं कि जब समाज का नेतृत्व कर्तव्यबोध, राष्ट्रचेतना और ऐतिहासिक समझ खो देता है, तब पराधीनता अनिवार्य हो जाती है। व्यंग्यात्मक शैली में रचित यह नाटक केवल आलोचना नहीं, बल्कि गहन राष्ट्रभावना और समय की चेतावनी का संदेश भी देता है।
“शतरंज के खिलाड़ी” हमें यह समझाता है कि राष्ट्र का भविष्य जागरूक नेतृत्व, सामाजिक उत्तरदायित्व और सामूहिक चेतना से ही सुरक्षित रहता है—अन्यथा विलासिता और उदासीनता किसी भी सभ्यता को भीतर से खोखला कर सकती हैं।
"कामायनी" | नागरी प्रचारिणी सभा वाराणसी की प्रस्तुति | निर्देशक- व्योमेश शुक्ल | केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान, सारनाथ | महाकवि जयशंकर प्रसाद साहित्य-संस्कृति महोत्सव
महाकवि जयशंकर प्रसाद की अमर कृति “कामायनी” हिंदी ही नहीं, विश्व साहित्य का अद्वितीय स्मारक है। इसे विश्व का पहला और अब तक का अंतिम भाव–महाकाव्य माना जाता है—एक ऐसा महाकाव्य जो भावनाओं, दर्शन और मानवीय चेतना को एक अद्भुत समन्वय में पिरोता है।
मनु और श्रद्धा की कथा के माध्यम से “कामायनी” मानव जीवन की उस आंतरिक यात्रा का वर्णन करती है, जहाँ भावना, बुद्धि और कर्म—ये तीनों मिलकर जीवन की पूर्णता रचते हैं। यह केवल एक कथा नहीं, बल्कि मानव मन, जीवन-दर्शन और अस्तित्व-बोध का गहन ग्रंथ है।
यह महाकाव्य हमें यह सत्य सिखाता है कि वास्तविक आनंद बाहरी वस्तुओं में नहीं, बल्कि आस्था, विश्वास, आत्मज्ञान और मानसिक संतुलन में निहित है।
“कामायनी” प्रेम, चेतना, आशा और मानव–अध्यात्म का गीत है—जो जीवन को अधिक उज्ज्वल, संतुलित और सार्थक बनाने की प्रेरणा देता है।
आज भी “कामायनी” मनुष्य के भीतर आत्मप्रकाश जगाने वाला दीपक है—जो बताता है कि मानवता की सबसे बड़ी शक्ति उसकी अंतःचेतना और आत्म–विश्वास में है।
"जनमेजय का नाग-यज्ञ" | राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD) नई दिल्ली की प्रस्तुति | निर्देशक- प्रवीण कुमार गुंजन | नागरी नाटक मंडली, वाराणसी | महाकवि जयशंकर प्रसाद साहित्य-संस्कृति महोत्सव
महाकवि जयशंकर प्रसाद का प्रसिद्ध नाटक “जनमेजय का नाग-यज्ञ” भारतीय संस्कृति, इतिहास और मानवता के गहन संदेशों से ओत–प्रोत एक प्रतीकात्मक नाटक है। इसकी कथा महाभारत के उस प्रसंग पर आधारित है, जिसमें राजा जनमेजय अपने पिता परीक्षित की मृत्यु का प्रतिशोध लेने हेतु नाग-यज्ञ का आयोजन करते हैं।
प्रसाद इस घटना के माध्यम से यह महान संदेश देते हैं कि प्रतिशोध का मार्ग अंततः विनाश की ओर ले जाता है, जबकि क्षमा, करुणा और संवाद ही सच्चे धर्म के पथ हैं। नाटक में जनमेजय के क्रोध से आत्मबोध तक की यात्रा मानव जीवन के नैतिक और आध्यात्मिक विकास का सशक्त प्रतीक बनकर उभरती है।
“जनमेजय का नाग-यज्ञ” केवल पौराणिक प्रसंग का नाट्य रूपांतरण नहीं, बल्कि एक शाश्वत मानवीय नाटक है, जो हमें अहिंसा, सहिष्णुता और उदारता का संदेश देता है—और यह स्मरण कराता है कि घृणा नहीं, प्रेम ही मानवता का स्थायी आधार है।
यह नाटक आज भी दर्शकों को प्रेरित करता है कि जीवन की किसी भी परिस्थिति में घृणा पर विजय पाने, भावनाओं को साधने और मनुष्यत्व को सर्वोपरि रखने का मार्ग ही सच्ची सभ्यता का पथ है।
"स्कन्दगुप्त" | गांधी हिंदुस्तानी साहित्य सभा एवं सुमुखा की प्रस्तुति | निर्देशक- अरविंद सिंह चंद्रवंशी | राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय NSD, नई दिल्ली
महाकवि जयशंकर प्रसाद का ऐतिहासिक नाटक “स्कन्दगुप्त” भारत की आत्मा, स्वाभिमान और पराक्रम का सजीव महाकाव्य है। यह कृति गुप्तवंश के प्रतापी सम्राट स्कन्दगुप्त विक्रमादित्य के जीवन-संघर्ष को आधार बनाकर रची गई है, जिन्होंने हूणों जैसे क्रूर विदेशी आक्रमणकारियों के सम्मुख अडिग खड़े होकर मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया। स्कन्दगुप्त यहाँ केवल रणभूमि का विजेता नहीं, बल्कि राष्ट्रधर्म से अनुप्राणित एक उच्चकोटि का चरित्र है।
“स्कन्दगुप्त” वस्तुतः राष्ट्रचेतना का तेजस्वी घोष है। यह सिखाता है कि सच्चा नेतृत्व वही है जो आत्मसंयम, त्याग और कर्तव्य के मार्ग पर चलते हुए व्यक्तिगत आकांक्षाओं का परित्याग कर दे। इस कृति में भारतीय दर्शन की सनातन भावना मुखर होती है—कर्तव्य ही धर्म है और त्याग ही वास्तविक विजय।
आज भी “स्कन्दगुप्त” साहस, कर्तव्यबोध, राष्ट्रनिष्ठा और भारतीय अस्मिता का प्रखर प्रतीक बनकर पाठकों और दर्शकों के मन में देशप्रेम की ज्वाला प्रज्ज्वलित करता है तथा पीढ़ियों को प्रेरणा देता चला आ रहा है।
"प्रसाद संगीतमयी संध्या, पद्मश्री सितार घराना - पंडित देवब्रत मिश्र" | संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय | महाकवि जयशंकर प्रसाद साहित्य-संस्कृति महोत्सव
महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट द्वारा आयोजित यह प्रतिष्ठित महोत्सव भारतीय साहित्य, संगीत और संस्कृति की प्राचीन गौरव–परंपरा और आधुनिक चेतना—दोनों का अद्वितीय सेतु है। यह केवल एक आयोजन नहीं; भारतीय आत्मा के पुनर्जागरण का उत्सव, हमारी सांस्कृतिक स्मृतियों का आलोक और प्रसाद की सृजन–दृष्टि का जीवंत विस्तार है।
पद्मश्री पंडित देवब्रत मिश्र की दिव्य उपस्थिति इस महोत्सव को अनुपम आध्यात्मिक ऊँचाई प्रदान करती है। उनका सितार–वादन भारतीय राग–परंपरा के सौंदर्य, गहराई और तपस्या को अभिव्यक्त करता है—जैसे प्रसाद के काव्य में निहित संगीत, उसी रूप में सुरों का प्रकाश दीप बनकर दर्शकों के हृदय को आलोकित करता हो।
यह महोत्सव भारतीय सांस्कृतिक अस्मिता, कलात्मक साधना और साहित्यिक संवेदना के स्वर्णिम पुनरुत्थान का भव्य प्रयास है। यहाँ प्रसाद के आदर्श, उनकी भारतीयता, जीवन–दर्शन और कला–चेतना केवल स्मरण नहीं किए जाते—वे वर्तमान में नव–स्वरूप लेकर पुनः प्रकट होते हैं।
यह आयोजन हमें विश्वास दिलाता है कि जब साहित्य और संगीत एक साथ प्रवाहित होते हैं, तो वे मानव–हृदय को न केवल संवेदनशील बनाते हैं, बल्कि संस्कृति को भी अनंत और अमर करते हैं।
"प्रसाद संगीतमयी संध्या, सुप्रचरित लोक–शास्त्रीय गायिका - सुश्री सुचरिता गुप्ता" | संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय | महाकवि जयशंकर प्रसाद साहित्य-संस्कृति महोत्सव
महाकवि जयशंकर प्रसाद साहित्य–संस्कृति महोत्सव में प्रसिद्ध लोक–शास्त्रीय गायिका सुचरिता गुप्ता की सुरमयी प्रस्तुति ने वातावरण को भाव–रस, माधुर्य और आध्यात्मिक संगीत–लय से संपूरित कर दिया। उनके स्वर में भारतीय लोक–रस की सहजता, शास्त्रीय संगीत की गहराई और आत्मा को छू लेने वाली संवेदनशीलता का अद्भुत संगम था, जिसने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
अपनी गायन–शैली के माध्यम से सुचरिता जी ने संवेदना, भक्ति, संस्कार और सांस्कृतिक चेतना का जीवंत प्रतीक प्रस्तुत किया। उनकी प्रस्तुति ने प्रसाद जी की साहित्यिक दृष्टि को संगीत की आत्मा से जोड़ते हुए एक अनूठा आध्यात्मिक–सांस्कृतिक सेतु रच दिया।
यह आयोजन साहित्य और संस्कृति का उच्चकोटि उत्सव बनकर उभरा—भारतीय संगीत–परंपरा की महिमा, रस–संपन्नता और आध्यात्मिक एकत्व का ऐसा अनुभव, जहाँ संगीत ने संस्कृति की दिव्यता को पुनः अभिव्यक्त किया और दर्शकों के मन–मंदिर में अनुराग, श्रद्धा और सौंदर्य का दीप प्रज्वलित कर दिया।
"प्रसाद संगीतमयी संध्या, अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त बाँसुरीवादक एवं निदेशक दूरदर्शन–आकाशवाणी - डॉ. राजेश गौतम" | संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय | महाकवि जयशंकर प्रसाद साहित्य-संस्कृति महोत्सव
महाकवि जयशंकर प्रसाद साहित्य–संस्कृति महोत्सव में डॉ. राजेश गौतम की दिव्य बाँसुरी–प्रस्तुति ने आयोजन को एक अद्वितीय ऊँचाई प्रदान की। उनकी बाँसुरी से निकली प्रत्येक धुन मानो भारतीय प्रकृति की सरसराहट, मानवीय आत्मा का स्पंदन और शाश्वत संस्कृति का रागात्मक अमृत बनकर वातावरण में विलीन हो गई।
उनके वादन में कला की साधना, संगीत की आध्यता और भारतीय सांस्कृतिक चेतना का ऐसा अनुपम समन्वय देखने को मिला, जो महाकवि प्रसाद की साहित्यिक विराटता से प्रेरित होकर संगीत को ध्यान, भाव और दर्शन के स्तर तक ले जाता है। उनके स्वर केवल सुने नहीं गए—बल्कि अनुभव किए गए, महसूस किए गए, और दर्शकों के भीतर गहरे उतरकर एक दिव्य कंपन जगाते चले गए।
डॉ. गौतम की प्रस्तुति एक संगीत कार्यक्रम से कहीं अधिक थी। यह भारतीय संस्कृति की आत्मा का उद्गम, सौंदर्य–बोध की शुद्ध धारा, और आध्यात्मिक संवेदना का जीवंत अवतार बनकर समक्ष उपस्थित हुई। उनकी बाँसुरी ने सहृदयों के मन–मंदिर में ऐसा प्रकाश प्रज्वलित किया, जो आयोजन को न केवल अविस्मरणीय, बल्कि विशिष्ट और कालातीत बना गया।
महाकवि जयशंकर प्रसाद साहित्य–संस्कृति महोत्सव–2025 | संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी
संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी में आयोजित महाकवि जयशंकर प्रसाद साहित्य–संस्कृति महोत्सव–2025 भारतीय साहित्य, कला और संस्कृति का अद्वितीय संगम और जीवंत उत्सव था। यह आयोजन केवल स्मृति–अर्पण नहीं, बल्कि महाकवि प्रसाद जी की सृजन–शक्ति, गहन मानवीय दृष्टि और भारतीय सांस्कृतिक मूल्य को पुनर्जीवित करने, उनके आदर्शों को आज के समाज में जीवंत करने और नई पीढ़ी तक पहुँचाने का अनूठा प्रयास था।
महोत्सव में प्रस्तुत साहित्यिक संवाद, संगीत, नृत्य और वाद्य–प्रस्तुतियों ने प्रसाद जी के बहुआयामी व्यक्तित्व और उनके अद्वितीय कलात्मक दृष्टिकोण को जीवंत कर दिया। यह केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं रहा, बल्कि भारतीय परंपरा, सौंदर्य–बोध, आध्यात्मिक चेतना और राष्ट्रीय गौरव का विराट उत्सव बन गया।
यह महोत्सव वाराणसी की पावन भूमि से उठती साहित्य और संस्कृति की अविरल धारा का प्रतीक है, जो सम्पूर्ण भारत में ज्ञान, प्रेरणा और सौंदर्य का प्रकाश फैलाती है। जैसे प्रसाद जी के शब्द आज भी हमारे हृदय में सृजनात्मक चेतना और संस्कृति की अग्नि प्रज्वलित करते हैं, यह महोत्सव उसी ज्वाला का जीवंत रूप प्रस्तुत करता है—एक ऐसा अनुभव जो दृष्टि, मन और आत्मा को समान रूप से आलोकित करता है।