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महाकवि प्रसाद के गीत —
" प्रसाद के गीतों का सौंदर्य संस्कारित और सात्त्विक चेतना से आलोकित है। उनका सौंदर्य भोगप्रधान न होकर आत्मसंयम, मर्यादा और पवित्रता से अनुप्राणित है। संस्कृत काव्य-परंपरा, उपनिषदिक विचारधारा और वैदिक नाद-बोध के सूक्ष्म संस्कार उनके गीतों में सहज रूप से प्रवाहित होते हैं। शब्दों की गरिमा, भावों की शुद्धता और रस की संतुलित अभिव्यक्ति उनके गीतों को एक उच्च सांस्कृतिक स्तर प्रदान करती है, जिससे उनका काव्य केवल भावुकता तक सीमित न रहकर जीवन-मूल्यों का संवाहक बन जाता है।
मीतमयता और संस्कारनिष्ठ सौंदर्य—का समन्वय ही प्रसाद के गीतों को अत्यंत प्रभावपूर्ण और कालजयी बनाता है। उनकी गीतात्मक अनुभूति पाठक के मन पर क्षणिक प्रभाव नहीं छोड़ती, बल्कि धीरे-धीरे अंतःकरण में उतरकर स्थायी संवेदना का रूप ले लेती है। नाद की मधुरता, लय की सहजता और भावों की गहराई मिलकर उनके गीतों को एक आध्यात्मिक ऊँचाई प्रदान करती है। यही कारण है कि महाकवि जयशंकर प्रसाद के गीत आज भी उतने ही प्रासंगिक, प्रभावशाली और सुंदर हैं, जितने अपने सृजनकाल में थे।
प्रसाद की संगीतात्मकता, संस्कृत परंपरा और भारतीय चेतना। उनके गीत संगीतबद्ध होने से पहले ही संगीतपूर्ण प्रतीत होते हैं—लय, ताल और नाद स्वतः उपस्थित रहते हैं। संस्कृत साहित्य, वैदिक-उपनिषदिक विचारधारा और भारतीय जीवन-दर्शन से प्राप्त संस्कार उनके गीतों को गरिमा और गहराई प्रदान करते हैं। इस प्रकार प्रसाद के गीत केवल सौंदर्य की अनुभूति नहीं कराते, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक चेतना के शाश्वत मूल्यों को भी अभिव्यक्त करते हैं। यही कारण है कि उनका गीत-काव्य आज भी प्रभावपूर्ण, प्रासंगिक और कालजयी बना हुआ है। "